छत्तीसगढ़
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बस्तर की देवगुड़ियां और मातागुड़ियां हुई लिपिबद्ध, 3456 देवगुड़ियों और मातागुड़ियों को मिला सामुदायिक वनाधिकार पत्र…..

जनजातीय समुदाय के अधिकांश समूह प्रकृति पूजक हैं वे पेड़-पौधों में अपने देवी-देवताओं का वास मानते हैं और इसी आस्था के फलस्वरूप वनों को बचाने के लिए अहम भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि इन देवस्थलों पर बहुतायत मात्रा में पेड़-पौधे पाये जाते हैं। इन देवस्थलों के परिसरों में वृहद स्तर पर फलदार एवं छायादार पौधरोपण किया जा रहा है। इसके साथ ही उक्त देवस्थलों का सामुदायिक वनाधिकार मान्यता पत्र प्रदान कर देवगुड़ियों एवं मातागुड़ियों सहित गोटुल एवं प्राचीन मृतक स्मारकों के भूमि को संरक्षित करने के उद्देश्य से सम्बंधित देवी-देवताओं के नाम से भूमि को राजस्व अभिलेख में दर्ज किया गया है। वहीं इन देवगुड़ियों-मातागुड़ियों और गोटुल एवं प्राचीन मृतक स्मारकों को उनके नाम से सामुदायिक वनाधिकार मान्यता पत्र जारी किया गया है, ताकि इन सांस्कृतिक-सामाजिक धरोहरों के परिसरों को अवैध कब्जा से बचाया जा सके। साथ ही इन धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में स्थानीय जनजातीय समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित किया जा सके।
    देश में पहली बार छत्तीसगढ़ राज्य एवं बस्तर संभाग देश का ऐसा संभाग है, जो आदिवासी समुदायों की आस्था एवं जीवित परम्पराओं के केन्द्र मातागुडी, देवगुडी, गोटूल, प्राचीन मृतक स्मारक, सेवा – अर्जी स्थल आदि के संरक्षण, संवर्धन तथा परिरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम के तहत देवी-देवताओं के नाम से ग्राम सभा को 2453 सामुदायिक वनाधिकार पत्र प्रदान किये गये हैं। इनमें कुल 7075 मातागुडी, देवगुडी, गोटूल, प्राचीन मृतक स्मारक के लिये 2607.20 हेक्टेयर (6466 एकड़) भूमि राजस्व अभिलेखों में प्रविष्टि कर संरक्षित किया गया है। बस्तर संभाग में कुल 22884 बैगा, सिरहा, मांझी, गुनिया, गायता, पुजारी, बजनिया, अटपहरिया आदि को राजीव गांधी भूमिहीन कृषक मजदूर न्याय योजना अन्तर्गत पंजीकृत किया जाकर प्रत्येक को प्रतिवर्ष 7000 रूपए प्रदान किया जा रहा है। बस्तर में क्षेत्रवार आदिवासी समुदायों के देवी-देवताओं की वाचिक परम्परा में प्रचलित मान्यताओं को लेखबद्ध कर उन्हें जारी किये गये सामुदायिक वन अधिकार के प्रपत्रों को संकलित कर “पुरखती कागजात’’ नामक (भाग एक) पुस्तिका तैयार की गई है। “पुरखती कागजात’’ (भाग-दो ) में संरक्षित खसरों का संकलन है, जिसमें भुईया के माध्यम से खसरे के कैफियत कॉलम में मातागुडी, देवगुड़ी के नाम व रकबा उल्लेखित कर राजस्व अभिलेख संरक्षित किया गया है।
      प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की मंशानुसार और बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री लखेश्वर बघेल के मार्गदर्शन में आस्था एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए देवगुड़ी तथा मातागुड़ी निर्माण एवं जीर्णोद्धार सहित गोटुल निर्माण कार्यों को प्राथमिकता के साथ पूर्ण किया जा रहा है। बस्तर अंचल की आस्था और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में 6283 देवगुड़ी और मातागुड़ी में से 3244 का जीर्णोद्धार की स्वीकृति दी गई है और अब तक 2320 देवगुड़ी एवं मातागुड़ियों का जीर्णोद्धार कार्य पूर्ण किया जा चुका है। वहीं स्वीकृत 297 गोटुल निर्माण कार्यों में से 200 कार्यो को पूर्ण किया गया है।


      बस्तर संभाग के अंतर्गत कुल 7075 देवगुड़ियों एवं मातागुड़ियों सहित गोटुल एवं प्राचीन मृतक स्मारकों में से 3619 देवगुड़ी-मातागुड़ी और गोटुल एवं मृतक स्मारक राजस्व, गैर वनभूमि, निजी भूमि तथा अन्य मदों की भूमि पर अवस्थित हैं, जिससे 898 हेक्टेयर रकबा भूमि संरक्षित है। वहीं शेष सभी 3456 देवगुड़ियों-मातागुड़ियों और घोटुल एवं प्राच्य मृतक स्मारकों का सामुदायिक वनाधिकार मान्यता पत्र समुदाय को प्रदान कर करीब 1709 हेक्टेयर रकबा भूमि संरक्षित किया गया है। लगभग 6466 एकड़ राजस्व भूमि को देव-मातागुड़ी के रूप में संरक्षित किया गया है। जिससे प्रोत्साहित होकर जनजातीय समुदाय के लोग स्वयं एक कदम आगे आकर देवगुड़ी तथा मातागुड़ियों को संवारने के लिये सक्रिय सहभागिता निभा रहे हैं और सांस्कृतिक-सामाजिक धरोहरों को सहेजने की दिशा में शासन के प्रयासों को सराहनीय निरूपित कर रहे हैं।
    इसके अलावा प्राधिकरण के द्वारा विगत पांच वर्षों में संभाग के सातों जिलों में 01 अरब 50 करोड़ 99 लाख रूपए की लागत के 7334 विकासमूलक कार्य स्वीकृत किये गये हैं। इसी अनुक्रम में दन्तेवाड़ा जिले में गरीबी उन्मूलन हेतु निजी भूमि पर नलकूप एवं समूह तार फेंसिंग, बायोफ्लॉक मछलीपालन आदि के लिये 2500 हितग्राहियों को 49 करोड़ 43 लाख 73 हजार रूपए की लागत के कार्य स्वीकृत किये गये हैं।
आदिवासी समुदायों के परम्पराओं एवं मान्यताओं पर आधारित सामाजिक ताना-बाना
बस्तर संभाग में निवासरत प्रमुख आदिवासी समुदायों यथा- गोड, हल्बा, भतरा, धुरवा, मुण्डा, मुरिया, कोया समुदाय के लोगों के जीवन में प्रचलित सांस्कृतिक रीति-रिवाजों एवं विभिन्न प्रकार के जन्म-मृत्यु संस्कारों, त्यौहारों, विभिन्न परम्पराओं एवं मान्यताओं पर आधारित सामाजिक ताना-बाना नामक पुस्तिका बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण द्वारा प्रकाशित की जा रही है। इन पुस्तकों का संबंधित समाजो के प्रतिनिधियों द्वारा लिपिबद्ध किया गया है।
बस्तर वीर सपूतों एवं वीरांगनाओं की प्रतिमा की स्थापना
बस्तर अंचल के महान वीर सपूतों एवं वीरांगनाओं की स्मृति को चिरस्थायी एवं जीवंत बनाए रखने के लिये वीर सपूतों एवं वीरांगनाओं की प्रतिमा की स्थापना हेतु 37 कार्य के लिए 392.03 लाख रूपए प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत किये गये हैं। बस्तर के ऐतिहासिक गौरवपूर्ण इतिहास में 1774-1910 तक हुए विभिन्न प्रकार के आदिवासी विद्रोह, हल्बा विद्रोह, भोपालपट्नम विद्रोह, परल कोट विद्रोह, तारापुर विद्रोह, मेरिया माड़िया विद्रोह, लिंगागिरी विद्रोह, कोई विद्रोह, मुरिया विद्रोह, भूमकाल विद्रोह आदि की तत्कालीन परिस्थितियों से आज की आने वाले पीढ़ियों को अवगत कराने एवं अपने गौरवपूर्ण इतिहास के प्रति आत्मगौरव जागृत कराने हेतु बस्तर का मुक्ति संग्राम नामक डॉक्यूमेंट्री सिरीज तैयार की जा रही है।
प्राधिकरण की अधिकृत वेबसाइट का शुभारंभ
बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण के कार्यों को और अधिक ग्रामीणों तक सुलभ बनाने के लिये बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण का अधिकृत वेबसाइट www.tdabastar.cgstate.gov.in तैयार किया गया है।
    गौरतलब है कि बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण का गठन राज्य शासन द्वारा 27 फरवरी 2019 को किया गया था। इसके अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष तथा सदस्य स्थानीय जनप्रतिनिधियों को बनाया गया है। प्राधिकरण अन्तर्गत संभाग के बस्तर, कोण्डागांव, नारायणपुर, कांकेर, दन्तेवाड़ा, बीजापुर एवं सुकमा जिले समाहित हैं। इसका मुख्य उद्देश्य बस्तर क्षेत्र में आदिवासियों की संस्कृति का परिरक्षण, संवर्धन एवं संरक्षण करना है, इस प्राधिकरण के अन्तर्गत क्षेत्र तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अन्य कार्य स्वीकृत किये जा रहे हैं।

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