Harvard से बाहर होंगे विदेशी छात्र? साउथ एशियन ग्रुप ने ट्रंप सरकार के फैसले को बताया सीधा हमला

हार्वर्ड का संकट: विदेशी छात्रों पर छाया संकट
यह लेख हार्वर्ड विश्वविद्यालय में ट्रम्प प्रशासन के एक फैसले के विरोध पर केंद्रित है जिससे विदेशी छात्रों के प्रवेश पर रोक लग गई है। लेख में हार्वर्ड के साउथ एशियन एसोसिएशन (SAA) की प्रतिक्रिया, प्रभावित छात्रों की संख्या, और इस फैसले के व्यापक प्रभावों पर चर्चा की गई है।
हार्वर्ड के साउथ एशियन एसोसिएशन का विरोध
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के साउथ एशियन एसोसिएशन (SAA) ने ट्रम्प प्रशासन के उस फैसले का पुरजोर विरोध किया है जिससे विदेशी छात्रों का प्रवेश रोक दिया गया है। SAA का मानना है कि यह फैसला न केवल अनुचित है बल्कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए एक बड़ा झटका है। उन्होंने इस फैसले को शिक्षा की आजादी और वैश्विक एकता के लिए खतरा बताया है। SAA ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे अपने अंतरराष्ट्रीय साथियों के साथ खड़े हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और छात्रों से इस मुश्किल घड़ी में एकजुट होकर समर्थन करने की अपील की है।
हार्वर्ड में विदेशी छात्रों का भविष्य अनिश्चित
अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के इस फैसले से हार्वर्ड विश्वविद्यालय का स्टूडेंट एंड एक्सचेंज विज़िटर प्रोग्राम (SEVP) प्रमाणन रद्द हो गया है। इसका सीधा सा मतलब है कि अब हार्वर्ड विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों को प्रवेश नहीं दे पाएगा। पहले से पढ़ रहे विदेशी छात्रों को या तो दूसरी यूनिवर्सिटी में जाना होगा या फिर अमेरिका में उनका कानूनी दर्जा खत्म हो जाएगा। यह फैसला न केवल छात्रों के करियर पर, बल्कि विश्वविद्यालय के वैश्विक माहौल पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।
SAA का समर्थन: ‘आप अकेले नहीं हैं’
साउथ एशियन एसोसिएशन ने इस फैसले पर बेहद भावुक प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है कि यह एक बड़ा झटका है, लेकिन वे अपने साथियों को यह आश्वस्त करना चाहते हैं कि वे अकेले नहीं हैं। उन्होंने सभी विदेशी छात्रों से कहा है, “आप हार्वर्ड का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और हम आपके साथ खड़े हैं।” SAA ने हार्वर्ड के प्रशासन और छात्रों से अपील की है कि वे मिलकर अंतरराष्ट्रीय छात्रों के अधिकारों की रक्षा करें।
साउथ एशियन छात्रों का महत्व
SAA ने बताया कि उनकी संस्था 1986 में बनी थी और तब से यह साउथ एशियन पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए एक मजबूत सहारा रही है। उनके सदस्य भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि देशों से आते हैं, और इनमें से कई प्रवासी, अंतरराष्ट्रीय या पहली पीढ़ी के अमेरिकी हैं। SAA का कहना है कि अगर यह फैसला लागू हुआ, तो हार्वर्ड कुछ सबसे होशियार और प्रतिभाशाली लोगों को खो देगा, और SAA को भी अपनी पहचान और समुदाय खोने का डर है।
भारतीय छात्र सबसे ज़्यादा प्रभावित
हार्वर्ड विश्वविद्यालय में इस समय दुनिया भर से लगभग 10,158 अंतरराष्ट्रीय छात्र और विद्वान पढ़ाई कर रहे हैं। हार्वर्ड इंटरनेशनल ऑफिस के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 के शैक्षणिक वर्ष में अकेले भारत से 788 छात्र और विद्वान हैं। अगर यह नया नियम लागू हुआ, तो इन सभी छात्रों को अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ सकती है या फिर उन्हें दूसरी यूनिवर्सिटी में जाना होगा। यह न केवल छात्रों के लिए, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए भी एक बुरा संकेत है जो शिक्षा के माध्यम से वैश्विक पहचान बनाना चाहते हैं।



